जुबेर कुरैशी 

​भोपाल। मध्य प्रदेश, जिसे कभी शांति का टापू कहा जाता था, आज वहां की सुरक्षा व्यवस्था अपने सबसे काले दौर से गुजर रही है। 'देश भक्ति-जन सेवा' का नारा अब थानों की दीवारों पर लिखे एक खोजी मजाक जैसा प्रतीत होता है। सरकारी आंकड़ों की भयावहता चीख-चीख कर कह रही है कि प्रदेश में कानून के रखवाले ही अब कानून को अपनी जेब में रखकर घूम रहे हैं। एक साल के भीतर 329 पुलिसकर्मियों पर आपराधिक मामले दर्ज होना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि मध्य प्रदेश पुलिस का अनुशासन ताश के पत्तों की तरह ढह चुका है। साथी मध्य प्रदेश पुलिस का मनोबल लगातार गिरता जा रहा है।

 दागदार वर्दी,जब रक्षक ही बने भक्षक 

​ पुलिस मुख्यालय सूत्रों के मुताबिक मध्य प्रदेश में पिछले 1 साल के दौरान एडिशनल एसपी स्तर के अधिकारियों से लेकर आरक्षक स्तर तक के 329 पुलिस वालों के खिलाफ हत्या, बलात्कार, अवैध वसूली, भ्रष्टाचार और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे संगीन अपराधिक प्रकरण दर्ज हुए हैं। इतनी बड़ी संख्या में पुलिस वालों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज होने से मध्य प्रदेश पुलिस का मनोबल गिर रहा है, पुलिस वालों को डर सताने लगाए की कार्रवाई के दौरान जरा सी चूक या गलती उन्हें जेल की हवा तक खिला सकती है।

' नाकाराओं का ' राज: काबिल हाशिए पर, 

 'एमपी पुलिस के पतन का सबसे बड़ा कारण 'पोस्टिंग का काला खेल' है। विभाग में एक ऐसा दौर शुरू हो गया है जहाँ योग्यता और वीरता को कचरे के डिब्बे में डाल दिया गया है। ​साइड लाइन हुए जांबाज: वे दबंग और तेजतर्रार पुलिस अधिकारी, जिनका नाम सुनकर कभी माफियाओ, अपराधियों और गुंडे बदमाशों के पसीने छूट जाते थे, आज 'लूप लाइन' में बैठकर फाइलो की धूल झाड़ रहे हैं। या तो उन्हें जानबूझकर फील्ड से बाहर रखा गया है या वे खुद फील्ड से दूर हो गए हैं क्योंकि वे 'सिस्टम' के हिसाब से समझौता नहीं करते।

 गिरता मनोबल,ईमानदारी की सजा और बेईमानी का इनाम 

जब एक ईमानदार सिपाही या अफसर देखता है कि उसके बगल वाला भ्रष्ट साथी मलाईदार पोस्टिंग पा रहा है और उसे सच बोलने पर सजा मिल रही है, तो मनोबल का गिरना स्वाभाविक है। ​इसके अलावा मध्य प्रदेश में तबादला अब एक उद्योग बन चुका है। जो अधिकारी माफियाओं पर हाथ डालता है, उसका 24 घंटे के भीतर तबादला कर दिया जाता है। यह संदेश साफ है—"काम मत करो, सिर्फ तालमेल बिठाओ।"

 अपराधी-पुलिस नेक्सस 

आज कई जिलों में पुलिस और अपराधियों के बीच की रेखा धुंधली हो गई है। पुलिस अब अपराधियों को पकड़ने के बजाय उनके 'पार्टनर' के रूप में काम कर रही है।

​ खाकी का खौफ खत्म 

जब जनता देखती है कि वर्दी वाला खुद अपराधी है, तो आम आदमी का भरोसा सिस्टम से उठ जाता है। आज स्थिति यह है कि फरियादी थाने जाने से डरता है कि कहीं उसे ही आरोपी न बना दिया जाए।
वही मध्य प्रदेश के कई जिलों के थानों की कमान उन 'नकारा' और 'अयोग्य' पुलिसकर्मियों के हाथों में है जो फील्ड वर्क के बजाय 'मैनेजमेंट' में माहिर हैं। ये वो लोग हैं जो अपराधियों से साठगांठ करते हैं, अवैध उगाही का हिस्सा ऊपर तक पहुँचाते हैं और कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते हैं।

 अपराधियों की 'शरणगाह' बने थाने 

​ मध्य प्रदेश के अधिकतर थानों के सूरत हाल यह है वहां अपराधियों की 'खातिरदारी' होती है और पीड़ित को दुत्कारा जाता है।
​भ्रष्टाचार की जड़ें: 329 एफआईआर यह वह आंकड़ा है जो सामने आ गया, लेकिन हजारों ऐसे मामले हैं जो फाइलों में ही दफन कर दिए गए। थानों में 'रेट कार्ड' फिक्स होने की चर्चाएं अब आम हैं। रेत माफिया, शराब माफिया और सट्टा किंग अब पुलिस के 'खास मेहमान' बनकर थानों में बैठते हैं।

​ अनुशासनहीनता का चरम 

निचले स्तर के कर्मचारियों में अपने सीनियर अधिकारियों का डर खत्म हो चुका है क्योंकि उन्हें पता है कि उनकी पीठ पर किसी न किसी बड़े नेता या रसूखदार का हाथ है। वही ​पुलिस की स्वायत्तता अब बीती बात हो गई है। थानों की पोस्टिंग अब एसपी कार्यालय से नहीं, बल्कि स्थानीय विधायकों और नेताओं के ड्राइंग रूम से तय होती है। जब थाना प्रभारी किसी नेता की सिफारिश पर बैठता है, तो वह कानून के प्रति नहीं, बल्कि अपने 'आका' के प्रति जवाबदेह होता है। इससे निष्पक्ष जांच की उम्मीद करना बेमानी है।

मनोबल बढ़ाना जरूरी 

​मध्य प्रदेश पुलिस की यह तस्वीर बेहद डरावनी है। 329 अपराधियों वाली यह 'फौज' प्रदेश को सुरक्षा देने के बजाय असुरक्षा का वातावरण पैदा कर रही है। यदि समय रहते 'नकारा' और 'अयोग्य' लोगों को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया गया और उन दबंग जांबाजों को वापस कमान नहीं सौंपी गई जो वर्दी की लाज रखना जानते हैं, तो वह दिन दूर नहीं जब मध्य प्रदेश में 'जंगलराज' पूरी तरह स्थापित हो जाएगा। ​पुलिस का गिरता मनोबल और बढ़ता अपराध बोध केवल एक विभाग की समस्या नहीं है, यह एक राज्य की बर्बादी का अलार्म है। सवाल यह है कि क्या सत्ता में बैठे लोग इस अलार्म को सुन रहे हैं या वे भी इस मूक बर्बादी का हिस्सा बने हुए हैं?