तेल और गैस पर रूस-चीन की बढ़ती नजदीकी, पुतिन का बड़ा कदम
मॉस्को: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने के बीच, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के एक बयान ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल पैदा कर दी है। पुतिन ने रूस और चीन के बीच एक ऐतिहासिक ऊर्जा समझौते के करीब पहुँचने की घोषणा की है, जो आने वाले समय में यूरेशियाई महाद्वीप में ईंधन के प्रवाह और अंतरराष्ट्रीय सामरिक समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है।
पावर ऑफ साइबेरिया-2: एक रणनीतिक पाइपलाइन
इस प्रस्तावित डील का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ 'पावर ऑफ साइबेरिया-2' पाइपलाइन परियोजना है। 2,600 किलोमीटर लंबी यह पाइपलाइन रूस के यामल प्रायद्वीप से शुरू होकर मंगोलिया के रास्ते उत्तरी चीन तक गैस पहुँचाएगी। योजना के अनुसार, इस मार्ग से अगले 30 वर्षों तक सालाना 50 अरब क्यूबिक मीटर गैस की आपूर्ति की जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि 2030 तक चीन को होने वाली कुल रूसी गैस आपूर्ति 100 बीसीएम के आंकड़े को पार कर सकती है, जो इसे दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा गलियारों में से एक बना देगा।
यूरोप से एशिया की ओर बड़ा बदलाव
यूक्रेन संघर्ष और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस ने अपनी ऊर्जा रणनीति का रुख पूरी तरह एशिया की ओर मोड़ दिया है। इस नई पाइपलाइन के सक्रिय होने से रूस के उस गैस निर्यात का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा चीन की ओर चला जाएगा, जो पहले यूरोपीय देशों को जाता था। यह बदलाव न केवल रूस की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगा, बल्कि ऊर्जा के क्षेत्र में यूरोप और अमेरिका के प्रभाव को भी चुनौती देगा।
वित्तीय और तकनीकी चुनौतियां
इस विशाल व्यापार की एक और खास बात डॉलर के बजाय युआन और रूबल में होने वाला लेन-देन है, जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में भी नए संकेत दे रहा है। हालांकि, सितंबर 2025 में हुई इस डील पर अंतिम कानूनी मुहर और गैस की कीमतों से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर चीन की पूरी सहमति मिलना अभी शेष है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के कारण इस सौदे में चीन की स्थिति मोलभाव के मामले में काफी मजबूत है। यदि यह समझौता पूरी तरह धरातल पर उतरता है, तो यह इस दशक का सबसे बड़ा ऊर्जा और भू-राजनीतिक परिवर्तन साबित होगा।
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