जुबेर कुरैशी, संपादक नारदमुनि लाइव*

​हाल के दिनों में बांग्लादेश से आई तस्वीरों ने रूह को कंपा दिया है। चटगांव हिल ट्रैक्ट्स (CHT) के अशांत क्षेत्रों से लेकर मैमनसिंह की सड़कों तक, हिंसा का जो नंगा नाच देखने को मिला, वह आधुनिक सभ्यता पर एक गहरा दाग है। विशेष रूप से चकमा समुदाय के युवाओं और अल्पसंख्यक समाज के लोगों को जिस तरह निशाना बनाया गया, वह केवल राजनीतिक अस्थिरता नहीं, बल्कि सीधे तौर पर 'इंसानियत की लिंचिंग' है।
बांग्लादेश: अफवाहों की आग और राख होता बचपन
​दिसंबर 2025 में मैमनसिंह में दीपू चंद्र दास नाम के एक 25 वर्षीय युवक को जिस तरह भीड़ ने घेरकर मारा और फिर उसके शरीर को आग के हवाले कर दिया, वह दृश्य किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार करने के लिए काफी है। केवल एक 'अफवाह' या 'ईशनिंदा' के शक पर किसी को जिंदा जला देना यह बताता है कि भीड़ के पास दिमाग नहीं होता, और न ही दिल।
​सितंबर 2024 से शुरू हुई खगड़ाछड़ी और रांगामाटी की हिंसा में चकमा और अन्य स्वदेशी जुम्मा समुदायों के घरों को फूँक दिया गया। कई युवाओं को अपनी जान गंवानी पड़ी। एक युवक जिसे भीड़ ने घेरकर मार डाला, उसकी गलती सिर्फ इतनी थी कि वह उस पहचान के साथ पैदा हुआ था जिसे भीड़ 'दूसरा' मानती थी।
​ *हिंदुस्तान: मॉब लिंचिंग का अंतहीन सिलसिला*
​दुखद बात यह है कि घृणा की यह आग सरहद के इस पार भी शांत नहीं है। भारत में भी पिछले कुछ वर्षों में मॉब लिंचिंग एक गंभीर बीमारी बन गई है। यहाँ भी गाय के नाम पर, चोरी के शक में या महज़ 'दूसरे धर्म' का होने के कारण भीड़ अचानक न्यायाधीश बन जाती है।
​धर्म की आड़ में हत्याएं: भारत में कई घटनाओं में मुस्लिम युवाओं को भीड़ द्वारा पीटे जाने और जान से मारने की खबरें आती रही हैं। 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, लिंचिंग की घटनाओं में मरने वालों में एक बड़ी संख्या मुसलमानों और दलितों की है।
​ *समान दर्द, समान क्रूरता*
जो बेबसी बांग्लादेश के एक चकमा या हिंदू युवक की आँखों में मरने से पहले रही होगी, वही बेबसी भारत में भीड़ का शिकार हुए किसी 'पहलू खान' या 'जुनैद' की आँखों में भी रही होगी।
​ भीड़ कानून बन जाए
​दोनों देशों की इन घटनाओं में एक बात समान है—न्याय का अभाव और भीड़ का उन्माद। जब कानून का डर खत्म हो जाता है और नफरत को राजनीतिक खाद मिलने लगती है, तो इंसान जानवर बन जाता है।
​"किसी को जिंदा जलाना या पीट-पीटकर मार डालना केवल एक हत्या नहीं है, बल्कि यह उस देश के संविधान और मानवीय मूल्यों का अंतिम संस्कार है।"
​हकीकत यह है कि खून का रंग न तो 'हरा' होता है और न ही 'भगवा'; वह सिर्फ लाल होता है। चाहे वह ढाका की सड़क हो या हरियाणा-यूपी का कोई गांव, जब एक माँ का बेटा जलता है, तो पूरी मानवता की रूह झुलसती है।
​हमें यह समझने की जरूरत है कि नफरत का कोई धर्म नहीं होता। अगर हम बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो हमें अपने मुल्क में हो रही लिंचिंग पर भी उतना ही मुखर होना होगा। चुप्पी हमेशा अपराधियों का साथ देती है।यह हम सबको याद रखना चाहिए! अंत में यही कि*

लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में,*

*यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है*
दुनिया के मशहूर शायर राहत इंदौरी साहब का यह शेर वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए बिल्कुल सटीक नजर आ रहा है

न्यूज़ सोर्स : Naradmunilive