मां की ममता और मौत का आगोश: बरगी की लहरों ने छीन लीं जिंदगी की सांसें
प्रकृति जब अपना रौद्र रूप दिखाती है, तो वह यह नहीं देखती कि सामने कौन है। बरगी डैम की अथाह जलराशि, जो कल तक पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र थी, अचानक काल का ग्रास बन गई। पानी की उफनती लहरों के बीच एक क्रूज क्या समाया, मानों कई परिवारों की खुशियां हमेशा के लिए खामोश हो गईं।

मौत के साए में भी नहीं छूटा 'ममता' का हाथ
सामने आई तस्वीरें रूह कपा देने वाली हैं। एक तस्वीर में पानी की सतह पर तैरती मां और उसके सीने से लिपटा मासूम बच्चा... यह दृश्य चीख-चीख कर कह रहा है कि मौत के खौफनाक मंजर में भी मां ने अपने कलेजे के टुकड़े को अकेला नहीं छोड़ा। पानी के थपेड़ों और डूबती सांसों के बीच भी उस मां की आखिरी कोशिश यही रही होगी कि वह अपने बच्चे को बचा ले। लाइफ जैकेट पहनी हुई थी, उम्मीदें भी थीं, लेकिन कुदरत के क्रूर फैसले के आगे सब बेबस नजर आए।
जब खुशियां मातम में बदल गईं
वह क्रूज, जिस पर लोग हंसी-मजाक और सुनहरी यादें संजोने सवार हुए थे, पल भर में श्मशान में तब्दील हो गया। लहरों का शोर लोगों की चीख-पुकार में दब गया। दूसरी तस्वीर में रेस्क्यू के बाद जब उन्हें बाहर निकाला गया, तो मां और बच्चे का वह अटूट बंधन मृत्यु के बाद भी वैसा ही था। मां की बंद आंखें और बच्चे का बेजान शरीर देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं।
कुछ सवाल जो पीछे छूट गए
यह हादसा कई गंभीर सवाल छोड़ गया है। क्या सुरक्षा के इंतजाम पर्याप्त थे? क्या क्षमता से अधिक लोग सवार थे? या फिर यह सिर्फ एक और 'हादसा' कहकर फाइलों में दबा दिया जाएगा? प्रशासन जांच की बात जरूर करेगा, लेकिन उन गोद सूनी होने वाली माओं और अनाथ होने वाले बच्चों की भरपाई कोई जांच नहीं कर सकती।
जबलपुर के इतिहास में यह दिन एक काले अध्याय की तरह दर्ज हो गया है। बरगी की लहरें शांत हो जाएंगी, लेकिन उन अपनों को खोने का गम कभी शांत नहीं होगा जिन्होंने अपनों को अपनी आंखों के सामने लहरों में खोते देखा।
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