भोपाल/जबलपुर। कटनी के पूर्व पुलिस अधीक्षक (SP) और वर्तमान में PHQ में पदस्थ अभिजीत कुमार रंजन के खिलाफ विभागीय जांच की तलवार लटक गई है। प्रशासनिक गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, गृह विभाग द्वारा तैयार की गई जांच फाइल अब मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) पहुंच चुकी है। इस मामले ने मध्य प्रदेश के पुलिस महकमे और राजनीतिक हलकों में सरगर्मी तेज कर दी है।

​क्या है विवाद की जड़?

​इस पूरे विवाद की शुरुआत एक पारिवारिक विवाद और पुलिसिया कार्रवाई से हुई थी। कटनी की तत्कालीन CSP ख्याति मिश्रा के पति और तहसीलदार शैलेंद्र बिहारी शर्मा ने एसपी पर गंभीर आरोप लगाए थे। आरोप है कि एसपी के निर्देश पर पुलिसकर्मियों ने उनके घर में घुसकर महिलाओं और एक 8 साल के मासूम बच्चे के साथ बदसलूकी और मारपीट की थी।

​मामले के तूल पकड़ने पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 1 जून 2025 को सोशल मीडिया के जरिए कड़ा रुख अपनाते हुए तत्कालीन एसपी को तत्काल हटाने के निर्देश दिए थे, जिसके बाद उन्हें भोपाल मुख्यालय अटैच कर दिया गया था।

​अधिवक्ता के पत्र ने खोली 'पेंडोरा बॉक्स'

​जबलपुर हाईकोर्ट के अधिवक्ता देवेंद्र शर्मा द्वारा मुख्यमंत्री को लिखे गए शिकायती पत्र ने इस मामले में कई नए और चौंकाने वाले खुलासे किए हैं:

  • फाइल दबाने का आरोप: पत्र में दावा किया गया है कि ACS होम और PHQ ने 3 महीने पहले ही जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय भेज दी थी, लेकिन प्रभाव का इस्तेमाल कर इसे आगे नहीं बढ़ने दिया जा रहा।
  • नियमों का उल्लंघन: अधिकारी पर सिविल सेवा आचरण नियमों के उल्लंघन के साथ-साथ, निर्धारित संख्या से अधिक संतान और शारीरिक फिटनेस मानकों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
  • CBI जांच की मांग: शिकायतकर्ता ने एसपी की सेवा अवधि के दौरान अर्जित कथित अकूत संपत्ति की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने की मांग की है।
  • सुरक्षा का खतरा: पीड़ित परिवार ने अपनी जान-माल की सुरक्षा को लेकर भी आशंका जाहिर की है।

​अब आगे क्या? (प्रशासनिक स्थिति)

​सूत्रों के हवाले से खबर है कि जबलपुर डीआईजी की प्रारंभिक जांच में दो प्रमुख आरोप सही पाए गए हैं। इसी आधार पर पुलिस मुख्यालय ने 6 पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट गृह विभाग को भेजी है।

कार्रवाई की संभावना: यदि विभागीय जांच (Departmental Enquiry) में आरोप सिद्ध होते हैं, तो अभिजीत रंजन की इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) रोकने, डिमोशन (पदावनति) या सेवा से बर्खास्तगी जैसी कठोर कार्रवाई हो सकती है।

 

​अब पूरी गेंद मुख्यमंत्री कार्यालय के पाले में है। देखना होगा कि जीरो टॉलरेंस की नीति पर चलने वाली मोहन सरकार इस हाई-प्रोफाइल मामले में क्या निर्णय लेती है।

न्यूज़ सोर्स : Naradmunilivr