जुबेर कुरैशी,संपादक
नारदमुनि लाइव*

हाल ही में दो फ़िल्म देखी थी एक थी धड़क 2 और दूसरी थी​ होमबाउंड  यह दोनों ही फिल्मे भारत में जातिगत भेदभाव की गहरी जड़ों और दलित वर्ग की नियति को दो अलग-अलग कोणों से पेश करती हैं। जो लोग यूजीसी के नए नियमों का विरोध कर रहे हैं उन्हें यह दोनों फिल्में जरूर देखनी चाहिए। धड़क 2 प्रेम के बहाने व्यवस्था के उस क्रूर चेहरे को बेनकाब करती है जो आज भी 'जातीय शुद्धता' के नाम पर सांसें छीन लेता है।यह फिल्म दिखाती है कि एक दलित युवा चाहे कितना भी पढ़-लिख जाए, सफल हो जाए, लेकिन समाज का एक बड़ा हिस्सा उसे आज भी उसकी योग्यता से नहीं, बल्कि उसकी जाति से आंकता है।
होमबाउंड' एक अलग तरह की पीड़ा को स्वर देती है। यह फिल्म उस अदृश्य वर्ग की कहानी है जो शहरों के निर्माण में अपना खून-पसीना लगाता है, लेकिन संकट आने पर जिनके पास सिर छुपाने की जगह नहीं होती।
इन दोनों फिल्मों को मिलाकर देखें तो भारतीय समाज की एक भयावह तस्वीर उभरती है। एक तरफ शिक्षा और आधुनिकता का दावा है, तो दूसरी तरफ आज भी घड़े से पानी पीने या अंतर्जातीय विवाह करने पर मौत का फरमान सुना दिया जाता है।
आज की राजनीति और समाज एक अजीबोगरीब विरोधाभास के दौर से गुजर रहे हैं। एक तरफ हम गर्व से ‘80% हिंदू एकता’ का उद्घोष करते हैं, वहीं दूसरी ओर जब उसी आबादी के 85% हिस्से (SC, ST और OBC) को उच्च शिक्षण संस्थानों में सम्मान और सुरक्षा देने की बात आती है, तो विरोध के सुर मुखर हो जाते हैं। यूजीसी (UGC) के नए ‘इक्विटी रेगुलेशन 2024’ पर मचा बवाल इसी मानसिक द्वंद्व का परिणाम है।
​ *आंकड़े गवाह हैं: बढ़ता भेदभाव और संस्थानों की चुप्पी*
​विरोध करने वालों का तर्क है कि इन नियमों की क्या जरूरत थी? जवाब यूजीसी के अपने आधिकारिक आंकड़ों में छिपा है। 2019 से 2024 के बीच जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। जब कैंपस में पोस्टर लगाने और संवेदनशीलता की बातें करने से समाधान नहीं निकला, तब जाकर यूजीसी को सख़्त और समयबद्ध नियमों का सहारा लेना पड़ा। यह कोई ‘विशेष सुविधा’ नहीं, बल्कि बढ़ते उत्पीड़न के खिलाफ एक जरूरी ‘सुरक्षा कवच’ है।
​इक्विटी कमेटी: न्याय का नया व्याकरण
​नए नियमों का सबसे क्रांतिकारी पहलू है—इक्विटी कमेटी (Equity Committee)। अब तक भेदभाव की जांच अक्सर उन्हीं लोगों के हाथ में होती थी, जिन पर भेदभाव करने का आरोप होता था। लेकिन अब
​ *जांच समिति में SC, ST और OBC का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा।*
​24-15-7 का फॉर्मूला: यानी 24 घंटे में बैठक, 15 दिन में जांच और 7 दिन में एक्शन।
यह समयसीमा उन संस्थानों के लिए खतरे की घंटी है जो सालों तक फाइलों को दबाकर छात्र का भविष्य बर्बाद कर देते थे।
​विशेषाधिकार बनाम समता: क्यों हो रहा है विरोध?
​विरोध का मुख्य आधार यह है कि इसमें ‘सामान्य वर्ग’ को शामिल क्यों नहीं किया गया और इसका ‘दुरुपयोग’ होगा। यह तर्क वैसा ही है जैसे महिला सुरक्षा कानून में पुरुषों को शामिल न करने पर आपत्ति जताना। जातिगत ढांचे का ऐतिहासिक सच यही है कि उत्पीड़न का शिकार बहुजन वर्ग रहा है, न कि विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग।
​जहाँ तक ‘दुरुपयोग’ की बात है, तो क्या इस डर से देश के तमाम श्रम कानून, दहेज विरोधी कानून या आरटीआई (RTI) को खत्म कर दिया जाना चाहिए? न्याय का सिद्धांत कहता है कि दुरुपयोग की आशंका न्याय की स्थापना में बाधक नहीं होनी चाहिए।
*दिखावे की एकता बनाम वास्तविक समानता*
​उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री बांटना नहीं, बल्कि एक समतामूलक समाज का निर्माण करना है। यदि हम एक ‘हिंदू राष्ट्र’ की कल्पना करते हैं, तो उस राष्ट्र की नींव में दलित, पिछड़ों और आदिवासियों के साथ होने वाले अन्याय का अंत होना पहली शर्त होनी चाहिए।
​कैंपसों में समानता भाषणों से नहीं, बल्कि जवाबदेही से आएगी। यूजीसी के ये नियम किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सड़ी-गली व्यवस्था के खिलाफ हैं जिसने जातिगत असमानता को ‘नॉर्मल’ मान लिया था। अब समय आ गया है कि हम दिखावे की एकता से आगे बढ़कर वास्तविक सामाजिक न्याय को स्वीकार करें।

न्यूज़ सोर्स : Naradmunilive