जुबेर कुरैशी,संपादक नारद मुनि लाइव 

​दिल्ली से लेकर स्थानीय नगर निगम तक, जब सत्ता के हर शिखर पर एक ही दल का ध्वज लहरा रहा हो, तब "अधिकारी नहीं सुन रहे" जैसा तर्क न केवल हास्यास्पद है, बल्कि जनता के विश्वास के साथ किया गया सबसे बड़ा क्रूर मजाक है। भागीरथपुरा में जो हुआ, वह महज़ एक 'हादसा' नहीं है; वह उस सड़ चुकी व्यवस्था का परिणाम है जहाँ विकास के नाम पर बिछाई गई सीवर लाइनें अब मौत के जाल में तब्दील हो चुकी हैं।
​सत्ता का अहंकार और बेबस जनता
​दो दशकों से ज्यादा का समय एक पीढ़ी के जवान होने के लिए काफी होता है। अगर इतने लंबे शासनकाल के बाद भी मंत्री, महापौर और तमाम जनप्रतिनिधि यह विलाप करें कि "अधिकारी बेलगाम हैं," तो सवाल यह उठता है कि फिर सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोग किस लिए हैं? क्या जनता ने उन्हें इसलिए चुना था कि वे अपनी विफलता का ठीकरा नौकरशाही पर फोड़कर पल्ला झाड़ लें?
​यदि अधिकारी नहीं सुन रहे, तो या तो नेतृत्व में इच्छाशक्ति की कमी है या फिर पर्दे के पीछे 'भ्रष्टाचार का ऐसा गठजोड़' है जो जनहित से बड़ा हो चुका है।
​नए सीवर प्रोजेक्ट: विकास या विनाश?
​करोड़ों-अरबों के बजट से बने ये नए सीवर प्रोजेक्ट आज मौत के कुएं क्यों बन गए हैं? भागीरथपुरा की घटना चीख-चीख कर कह रही है कि काम की गुणवत्ता के साथ समझौता किया गया है। घटिया निर्माण, बिना सुरक्षा मानकों के काम और समय सीमा को ताक पर रखने की राजनीति ने शहर की रगों (सीवर लाइनों) को चोक कर दिया है।
​सवाल तो बनता है: जब शिलान्यास के पत्थर पर नाम लिखवाने की होड़ मचती है, तो फिर हादसों की जिम्मेदारी लेने के वक्त सब मौन क्यों हो जाते हैं? क्या जनता की बलि लेना ही इस 'घटिया राजनीति' का अंतिम लक्ष्य है?
​एक मार्मिक सच
​आज भागीरथपुरा के उस घर में मातम है जिसने अपना चिराग खोया है। कल यह हादसा किसी और गली, किसी और मोहल्ले में हो सकता है। क्योंकि जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, जब तक कुर्सी पर बैठे लोग खुद को "जनसेवक" समझकर अधिकारियों को काम के प्रति बाध्य नहीं करेंगे, तब तक मासूमों की जान ऐसे ही सडकों और गटरों में जाती रहेगी।
​अब समय आ गया है कि जनता केवल आश्वासन न मांगे, बल्कि परिणाम मांगे। यदि आप व्यवस्था नहीं सुधार सकते, यदि आप अधिकारियों से काम नहीं ले सकते, तो नैतिकता के नाते उस पद पर बने रहने का आपको कोई अधिकार नहीं है।

न्यूज़ सोर्स : Naradmunilive