MP के पूर्व DGP सुधीर सक्सेना समेत 6 बड़े पुलिस अफसरों को कोर्ट का नोटिस, 25 साल तक की हो सकती है सजा
​भोपाल | भारत की आजादी के 78 वर्षों के इतिहास में संभवतः यह पहला ऐसा मामला है, जहाँ पुलिस महकमे के सबसे ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों के खिलाफ उनके ही एक अधीनस्थ (रिटायर्ड DSP) ने कानूनी जंग जीती है। मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय (PHQ) में पदस्थ रहे एक सेवानिवृत्त प्रथम श्रेणी उप पुलिस अधीक्षक विजय पुंज के साथ किए गए 'अमानवीय और दमनकारी' व्यवहार पर न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है।
​इन दिग्गजों को मिला कोर्ट का नोटिस
​माननीय न्यायालय प्रथम श्रेणी ने मामले की गंभीरता और साक्ष्यों को देखते हुए निम्नलिखित अधिकारियों को धारा 233 BNSS के तहत नोटिस जारी किया है:
​सुधीर सक्सेना (सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक - DGP)
​गोविंद प्रताप सिंह (सेवानिवृत्त विशेष पुलिस महानिदेशक)
​नीता पंडोल (सेवानिवृत्त अधिकारी)
​धनवंती रैकवार (सेवानिवृत्त अधिकारी)
​हेलन सोनाली सोना (सहायक महानिरीक्षक)
​सुनील कौशल (सहायक उप निरीक्षक)
​क्या है पूरा मामला?
​शिकायतकर्ता अधिकारी (सेवानिवृत्त DSP) ने आरोप लगाया था कि उनके कार्यकाल के दौरान इन वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए उन पर संगठित तरीके से अत्याचार किए और अमानवीय कृत्य किए। वादी और गवाहों के बयानों के बाद, न्यायालय ने प्रथम दृष्टया इसे अपराध माना है।
​इन धाराओं में दर्ज हुआ मामला:
अदालत ने भारतीय दंड विधान (IPC) की धारा 408, 201, 120-B, 384 और 511 के तहत अपराध का संज्ञान लिया है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ये आरोप सिद्ध होते हैं, तो इन अधिकारियों को 25 वर्ष तक की जेल हो सकती है।
​29 दिसंबर को होना होगा पेश
​पुलिस मुख्यालय ने कोर्ट के नोटिस सभी आरोपियों को तामील (Serve) करवा दिए हैं। अब इन सभी अधिकारियों को 29 दिसंबर 2025 को माननीय न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना होगा। अदालत ने इन्हें 'नैसर्गिक न्याय' के सिद्धांत के तहत अपना पक्ष रखने का अंतिम अवसर दिया है।
​गिरफ्तारी की लटकी तलवार: यदि आरोपी अधिकारी कोर्ट को संतोषजनक जवाब देने में विफल रहते हैं, तो न्यायालय उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर सकता है और नियमित आपराधिक ट्रायल (Criminal Trial) शुरू कर दिया जाएगा।
​व्यवस्था के लिए बड़ा संदेश
​यह मामला न केवल मध्य प्रदेश बल्कि देश भर की पुलिस व्यवस्था के लिए एक बड़ा संदेश है। यह साबित करता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह राज्य का पुलिस प्रमुख ही क्यों न हो। पद का दुरुपयोग कर अधीनस्थों का दमन करने वाले अधिकारियों के लिए यह प्रकरण एक नजीर (Example) बन गया है।

न्यूज़ सोर्स : Naradmunilive