जुबेर कुरैशी 

संपादक,नारद मुनि लाइव  

  आज बात करेंगे उस राजनीतिक भाषा की… जिसने लोकतंत्र की गरिमा के साथ-साथ देश की महिलाओं के मान सम्मान को  तार-तार कर दिया।
 कभी सार्वजनिक मंच से प्रधानमंत्री की दिवंगत मां को गाली दी जा रही है तो कभी किसी महिला को जर्सी गाय … कांग्रेस की विधवा… 50 करोड़ की GF का तंज झेलना पड़ा… तो किसी पर बुर्के के पीछे छुपने जैसे शब्द कसे गए। आखिर देश की महिलाओं के अपमान और उनके प्रति आमर्यादित  भाषा की शुरुआत कहां से और कैसे हुई,, चलिए सबसे पहले इस पर नजर डालते हैं....
 राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो  2014 के बाद से राजनीति में ये ज़हर घुला… 2014… भारतीय राजनीति का एक अहम मोड़।
जब सत्ता बदली… और साथ ही बदली राजनीतिक शब्दावली।
वो भाषा, जो पहले चाय की दुकानों और नुक्कड़ बहसों तक सीमित थी… अब संसद और चुनावी मंचों तक पहुँच गई।
जर्सी गाय कहकर सोनिया गांधी पर हमला बोला गया…
कांग्रेस की विधवा कहकर विपक्ष की छवि को चोट पहुँचाई गई…
50 करोड़ की गर्लफ्रेंड कहकर एक महिला  की गरिमा को सवालों में घसीटा गया…
ये सब शब्द सिर्फ बयान नहीं थे… ये थे नए दौर की राजनीति का आईना..और आज हालात ये हैं कि जनता मुद्दों पर नहीं… बल्कि नेताओं की ज़बानी जंग पर हंस रही है, ताली बजा रही है।
लेकिन सवाल है – क्या यही लोकतंत्र है? क्या यही संसद की भाषा है? और क्या मां-बहन-बेटियों के लिए ऐसे शब्द स्वीकार्य हैं?
सोचिए… ये वही देश है, जहाँ कहा जाता है – मां किसी की भी हो… मां होती है। लेकिन अफसोस... हमारे नेताओं ने राजनीति की नफ़रत में माँ को भी गाली बना दिया।
ये सिर्फ एक परिवार या एक पार्टी का अपमान नहीं है... बल्कि पूरे देश की माताओं का अपमान है।
लेकिन अफसोस… राजनीति की गंदी भाषा ने इस सम्मान को भी कुचल दिया।
कभी संसद के भीतर कहा गया – रेनकोट पहनकर नहाना…
तो कभी टीवी डिबेट्स में महिला नेताओं की तुलना मुजरे से की गई।
हंसी तक को शूर्पनखा की हंसी कहा गया।
क्या ये उस भारत की तस्वीर है, जिसकी सभ्यता और संस्कृति पर पूरी दुनिया गर्व करती है ?
राजनीति की ये भाषा सिर्फ नेताओं तक नहीं रुकी।
धीरे-धीरे इसका असर समाज पर भी दिखने लगा।
आज गली-मोहल्लों में, सोशल मीडिया पर, बहसों में… लोग नेताओं की यही भाषा दोहराते हैं।
युवा पीढ़ी, जो राजनीति से प्रेरणा लेती थी… वो अब गालियों और तानों की राजनीति सीख रही है।
कभी नारी सम्मान की बातें करने वाले नेता… महिलाओं के लिए बुर्के के पीछे जैसी बातें करते हैं।
और जनता ताली बजाती है… मानो ये कोई मनोरंजन हो।
लेकिन सवाल है – अगर नेता गाली देंगे… तो जनता क्या सीखेगी?
ये भाषा सिर्फ विपक्ष तक सीमित नहीं रही।
शब्दों के इस युद्ध में हर दल, हर नेता शामिल हुआ।
मजहबी ताने, जातिगत कटाक्ष, औरतों के लिए गंदी उपमाएं… सब राजनीति का हिस्सा बन गए।
लेकिन संसद, विधानसभा और चुनावी मंच – क्या ये तमाशे के अखाड़े हैं?
क्या नेताओं को यही संस्कार सिखाए जाते हैं कि विरोधियों पर हमला करने के लिए मां, बहन और बेटियों को बीच में घसीटो?
अगर इतिहास पर नज़र डालें तो…
नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक – नेताओं की असहमति हमेशा रही।
लेकिन भाषा में गरिमा भी रही।
अटल बिहारी वाजपेयी संसद में जब बोलते थे… तो विपक्ष तालियाँ बजाता था।
नेहरू जब बोलते थे… तो विरोधी भी सम्मान जताते थे।
लेकिन आज हालात उलटे हैं।
अब नेता बोलते हैं… और जनता शर्मिंदा होती है।
तो फिर जिम्मेदार कौन है?
क्या ये सिर्फ नेताओं की गलती है? या जनता की भी, जो ताली बजाकर इस भाषा को बढ़ावा देती है?
सोचिए… अगर जनता हर गाली पर चुप रहेगी, हर ताने पर ताली बजाएगी… तो नेता क्यों सुधरेंगे?

लोकतंत्र में भाषा ही सबसे बड़ा हथियार है।
लेकिन जब वही भाषा गंदी हो जाए… तो लोकतंत्र की आत्मा घायल हो जाती है।
लोकतंत्र गालियों से नहीं चलता।
लोकतंत्र चलता है — विचारों से, मुद्दों से और जनता की उम्मीदों से।
जब नेता मुजरा, जर्सी गाय, विधवा और गर्लफ्रेंड जैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं...
तो वो खुद को नहीं, लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुँचाते हैं।
आज जरूरत है, जनता सवाल पूछे –
क्या हमें ऐसे नेता चाहिए, जो मां-बहनों का मज़ाक उड़ाएं?
क्या हमें ऐसे शब्द चाहिए, जो समाज में नफरत फैलाएं?
और क्या हमें ऐसे नेता चाहिए, जिनकी जुबान से संस्कार नहीं, सिर्फ जहर निकले?
दोस्तों… राजनीति में असहमति ज़रूरी है… विपक्ष ज़रूरी है…
लेकिन असहमति का मतलब गाली नहीं होता।
सवाल पूछना लोकतंत्र की ताकत है… लेकिन सवाल पूछने के लिए मां-बहन की इज्ज़त दांव पर लगाना कमजोरी है।
इसलिए हम बार-बार कहते हैं –
मां किसी की भी हो… मां होती है।
अगर नेताओं को ये बात समझ में नहीं आती… तो समझ लीजिए – हमारी राजनीति सिर्फ सत्ता की लड़ाई रह जाएगी… और लोकतंत्र का असली मतलब हमेशा के लिए खो जाएगा।
भारत की राजनीति को फिर से मर्यादा चाहिए।
वरना आने वाली पीढ़ियाँ नेताओं को राजनीतिक आदर्श नहीं, गालीबाज़ समझेंगी।
याद रखिए...
सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन शब्द हमेशा इतिहास में दर्ज रह जाते हैं,, इसलिए आप भी महिलाओं का सम्मान जरूर करें