सूरमा की बात के चाहने वाले सभी हज़रात को आदाब। आज दो अलग मिज़ाज़ की खबरें लेकर हाज़िर है आपका दोस्त सूरमा। कम वक्त में उर्दू शायरी में अपनी पहचान बनाने वाले शायर शोएब अली खां 'शाद' के इंतकाल की खबर सभी को दुखी कर गई। शोएब मियां कैंसर में मुब्तिला होके तीन चार महीनों मेई चटपट हो गए। उधर भोपाल के नामवर सहाफी मनीष श्रीवास्तव साब को पीटीआई ने अपना एसोसिएट एडिटर बनाया है। 
🔴एक आवाज़ ख़ामोश हुई, कई महफ़िलें वीरान हो गईं
      शोएब 'शाद' की रुख़्सती पर भोपाल अश्कबार है
"मेरे शेर अब गुनगुनाने लगे हैं
वो शम्मे मुहब्बत जलाने लगे हैं।
उधर काली काली घटा छा रही है,
इधर वो बहुत याद आने लगे हैं।"
ये अश्आर अब पढ़िए तो ऐसा महसूस होता है जैसे मरहूम शायर शोएब अली ख़ां 'शाद' ने अपनी जुदाई का एहसास पहले ही अल्फ़ाज़ में ढाल दिया था। गुज़िश्ता 1 जुलाई को भोपाल के इस मक़बूल शायर, बेहतरीन नाज़िम, ख़ुश-आवाज़ फ़नकार और ज़िंदादिल इंसान ने कैंसर जैसे मूज़ी मर्ज़ से जंग लड़ते-लड़ते दुनिया को अलविदा कह दिया। महज 64 की उमर में जब अस्पताल से उनके इंतिक़ाल की ख़बर आई तो भोपाल के उर्दू अदब और सक़ाफ़ती हल्क़ों में जैसे सन्नाटा पसर गया। हर ज़बान पर एक ही जुमला था... "अरे, शोएब भाई भी चले गए?" शोएब भाई सिर्फ़ ग़ज़ल और नज़्म कहने वाले शायर नहीं थे, वो महफ़िल की जान थे। जिससे भी मिलते, ऐसे खुलूस, ऐसी मुहब्बत और ऐसा अपनापन कि बरसों की जान-पहचान महसूस होने लगती। उनकी बुलंद और पुरकशिश आवाज़ ने भोपाल के न जाने कितने सक़ाफ़ती जलसों को यादगार बनाया। एंकरिंग हो, मुशायरे की निज़ामत हो या मौसीक़ी की महफ़िल... शोएब भाई माइक संभाल लेते तो समां बंध जाता। बहुत कम लोग जानते हैं कि वो एक उम्दा सिंगर भी थे। उनकी आवाज़ में ऐसा असर था कि सुनने वाले देर तक उसी कैफ़ियत में रहते। उनकी शायरी में ज़िंदगी का फ़लसफ़ा भी था और संघर्ष की तपिश भी। मुलाहिज़ा फ़रमाइए उनका ये शेर:
"चेन से हम जी रहे थे पहलु-ए-भोपाल में
क्यों हमें ले आई किस्मत जादुई बंगाल में।"


गुज़िश्ता दिनों जब मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की डायरेक्टर नुसरत मेहदी साहिबा उनकी अयादत के लिए पहुंचीं, तब भी शोएब भाई की ज़िंदादिली में कोई कमी नहीं आई थी। बीमारी से लड़ते हुए भी मुस्कुराकर बातें करते रहे। भोपाल के वेटरन एंकर इफ़्तेख़ार साहब से उन्होंने वादा किया था कि 5 जुलाई को आपके स्टूडियो ज़रूर आऊंगा। मगर अफ़सोस... क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। वो वादा अधूरा रह गया और शोएब भाई हमेशा के लिए ख़ामोश हो गए। उनके इंतिक़ाल की ख़बर जिसने भी सुनी, सदमे में रह गया। उनकी याद में मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी और खानूगांव में ताज़ियाती जलसे हुए। सफ़दर भाई, विजय तिवारी, डॉक्टर नज़ीर मुहम्मदी, बद्र वास्ती, इक़बाल मसूद साहब, ज़फ़र सहबाई, डॉक्टर मेहताब आलम समेत तमाम उर्दू अदीबों और अहबाब ने गहरे रंज़ो-ग़म का इज़हार किया। पुतलीघर स्थित उनके आबाई मकान से जनाज़ा उठा। भोपाल टॉकीज़ के पास वाले क़ब्रिस्तान में तदफ़ीन के वक़्त भोपाल ही नहीं, अतराफ़ से भी उनके चाहने वाले बड़ी तादाद में मौजूद थे। हर आंख नम थी और हर दिल यही कह रहा था कि शहर ने अपना एक सच्चा फ़नकार खो दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि शोएब अली ख़ां तक़रीबन बीस-बाईस बरस सऊदी अरब में मुलाज़मत करते रहे। इस दौरान उन्हें कई बार हज की सआदत भी नसीब हुई। अपने पीछे वो अपनी अहलिया और एक बेटे को छोड़ गए हैं। लेकिन अस्ल मानी में वो अपने चाहने वालों के दिलों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे। उनकी आवाज़, उनकी मुस्कुराहट, उनकी महफ़िलें और उनके अश्आर उन्हें कभी भुलाने नहीं देंगे।मरहूम शोएब अली ख़ां 'शाद' को सूरमा की बात की जानिब से ख़िराजे-अक़ीदत पेश करते हुए उनके ही अश्आर पर इख़्तिताम करता हूं
"है शहीदों का फ़ैज़े क़ुर्बानी
दोस्ती का सबक़ है लाफानी।
शाद इस में लहू शहीदों का,
ज़ाफ़रानी, सफ़ेद और धानी।"

🔴जो ज़मीन से जुड़ा रहा, वही आसमान तक पहुंचा
     मनीष मियां की तरक़्क़ी इसी उसूल की मिसाल है।


मनीष श्रीवास्तव भोपाल के उन सहाफ़ियों (पत्रकार) में शुमार हैं जो माशा अल्लाह भोत तालीमयाफ्ता, शाइस्ता, नफीस और निहायत खुशअख़लाक़ इंसान हैं। इनका आबाई (पूर्वजों का) ठिकाना तो राजगढ़ ज़िले का नरसिंहगढ़ है, बाकी खां, भाई मियां की पूरी तालीम-ओ-तरबियत भोपाल में ही हुई। मियां खां कैम्पियन स्कूल में पढ़े। एमवीएम कालिज से इन्ने बीएससी करा। बाद में मियां खां ने सोशियोलॉजी में एमए करके एमफिल भी कर लिया। भाई की अंग्रेज़ी पे लपक पकड़ हेगी। मनीष मियां चाहते तो   सूबे में आला अफसर हो जाते, या किसी कारपोरेट कम्पनी में उम्दा पोस्ट पे बेठे होते। बाक़ी भाई का रुझान किसी चमक दमक वाली मुलाज़मत के बजाय शुरुसेई सहाफत (पत्रकारिता) की तरफ था। लिहाज़ा 1995 में भास्कर ग्रुप के नेशनल मेल में रिपोर्टर हो गए। इसके बाद क्रोनिकल, डेक्कन क्रोनिकल, द पेट्रियट में भी इन्ने अपना हुनर दिखाया। साल 1997 में मनीष ने जो पीटीआई का दामन थामा तो आज 29 बरस बाद भी यहां उनका सफर जारी है। सन 2000 से 2007 तक ये पीटीआई इंदौर में ब्यूरो चीफ और मेनिजर के ओहदे पर रहे। इनके काम को लेकर संजीदगी के चलते पीटीआई मैनेजमेंट ने इन्हें 2014 में भोपाल में स्टेट ब्यूरो चीफ की ज़िम्मेदारी सौंपी। अभी चंद रोज़ पेलेई भाई को पीटीआई भोपाली में एसोसिएट एडिटर के ओहदे पे तरक्की मिली है। खास बात ये है कि पीटीआई मध्यप्रदेश में एसोसिएट एडिटर की पोस्ट नहीं रखती। मनीष भाई को पीटीआई की तारीख (इतिहास) में यहां इस ओहदे पे तरक्की दी गई है। अंग्रेज़ी के इस पत्रकार की खासियत इनका ज़मीन से जुड़े रहना, सब की मदद के लिए हमेशा पेश पेश रहना है। आमतौर पे देखा जाता है कि सहाफ़ियों में किसी को प्रमोशन क्या मिलता है तो भाई सीना तान के एटीट्यूड दिखाने लगता है। बाकी अपने मनीष भाई हमेशा सूत-गुनिये में रेते हेंगे। गोया की भाई का मिज़ाज़ ही कुछ ऐसा हेगा के न पाने की खुशी न खोने का ग़म। तो खां भाई मियां आपको मिले इस ऐतिहासिक प्रमोशन के लिए दिल से मुबारकबाद।