आप सभी हज़रात को सूरमा का प्यार भरा आदाब। इस कॉलम में सूरमा आपको भोपाल के उन सहाफियों (पत्रकारों) से भी मिलवाता है जिन्होंने सहाफत को नए आयाम दिए। जिनका किरदार उनके दुनिया से जाने के बाद भी मीडिया जगत में याद किया जाता है। इस कड़ी में सूरमा ने भोपाल के अंग्रेज़ी पत्रकार मरहूम नासिर कमाल उर्फ मामू की अज़मत को बयां करने की कोशिश की है

  नासिर कमाल उर्फ मामू जिसने सहाफत को नोकरी नहीं दोस्ती और मोहब्बत की तरह जिया

आइये आज आपकी मुलाक़ात करवाते हैं भोपाल के अंग्रेज़ी के ऐसे सहाफी (पत्रकार) से, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं… बाकी उनकी सादगी, ईमानदाराना सहाफत, इस पेशे की बारीक समझ, अंग्रेज़ी ज़ुबान पर लपक पकड़ और अपने साथी सहाफ़ियों का हद से बढ़ कर ताव्वुन (सहयोग) आज भी पुराने अहल-ए-कलम के दिलों में ज़िंदा है। जनाब, यहां टाइम्स ऑफ इंडिया के मशहूर कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण के आम आदमी की मूरत के साथ आप जिस इंसान की तस्वीर देख रहे हैं, उनका नाम था नासिर कमाल। दुबला पतला जिस्म, खिचड़ी दाढ़ी, बिखरे बाल और आँखों पे मोटे फ्रेम का चश्मा उनकी पर्सनाल्टी को अनूठा अंदाज़ देता। और मियां, नाम के मुताबिक वाकई कमाल के सहाफी थे। अस्सी की दहाई की इब्तिदा में नासिर भाई ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से उर्दू में एमए किया। अंग्रेज़ी के साथ-साथ उर्दू पर भी ऐसी लपक-पकड़ कि बड़े-बड़े उस्ताद दांतों तले उंगली दबा लें। तालीम मुकम्मल करके भोपाल लौटे तो दिल में सहाफत करने के अरमान कुलबुलाने लगे। लिहाज़ा 1983 में इंदौर के फ्रीप्रेस में रिपोर्टर हो गए। वहां सहाफी लेमुअल लाल को उनकी याद आज भी बड़े अपनापे से आती है। बाकी मियां का दिल भोपाल से दूर कहां लगना था! सो वापस भोपाल लौट आए और एमपी क्रोनिकल में काम शुरू कर दिया। उसी दौरान मरहूम रमेश अग्रवाल ने अंग्रेजी दैनिक भास्कर शुरू किया। उस वक़्त एन. राजन साब एडिटर थे। यहां नासिर भाई को हसन साब, डॉ. एजाज़ शरीफ, मरहूम सगीर बेदार, मरहूम मुस्लिम सलीम, मरहूम अब्दुल ख़ालिक़, परवेज़ बारी,भरत देसाई, जफर आलम खान, विश्वनाथ, अर्जुन सिंह और ताजदार ज़ेदी जैसे साथियों का साथ मिला। वैसे हम हिंदी भास्कर वाले जगत पाठक, अलीम बज़मी, राजेश चंचल और इन पंक्तियों के लेखक से भी नासिर भाई के बड़े उम्दा राब्ते रहे। बाद में अंग्रेजी भास्कर का नाम बदल कर “नेशनल मेल” कर दिया गया। वहीं नासिर कमाल का मशहूर कॉलम 'भोपाल देन एंड नाउ' खूब मक़बूल हुआ। अब लोग उन्हें नासिर कमाल से ज़्यादा 'मामू'के नाम से जानने लगे थे। और सच पूछिए तो भोपाल, भोपालियत, नवाबी दौर, पुराने किस्से-कहानियां और शहर की तहज़ीब पर मामू जैसा जानकार कम ही मिलेगा। मामू ओरिजनल भोपाली थे। भोपाल की तारीख और रिवायतों को उनसे बेहतर कोई नहीं जानता था। अख़बार में भोपाल से जुड़ा कोई मसला हो तो साथी पत्रकार सीधे मामू की चौखट पर दस्तक देते। कुछ अरसा वो बेंगलुरु की अंग्रेजी मैगज़ीन 'मीनटाइम' में भी रहे। लेकिन भोपाल की मुहब्बत उन्हें वापस भोपाल खींच लाई। साल 2000 में हिंदुस्तान टाइम्स भोपाल से लॉन्च हो रहा था। अस्करी ज़ेदी संपादक थे और अभिलाष खांडेकर ब्यूरो चीफ। तब मामू ने हिंदुस्तान टाइम्स ज्वाइन किया। यहां राकेश दीक्षित, शम्सुर्रहमान अल्वी, आशुतोष शुक्ला, श्रावणी सरकार, देशदीप सक्सेना,अम्बरीष मिश्रा, अनिल दुबे जैसे साथी मिले। हिंदुस्तान टाइम्स में मामू का कॉलम 'टाइम मशीन' बहुत पढ़ा गया। दरअसल नवाबी शहरों पर इस अंदाज़ में रोचक कॉलम अंग्रेजी अख़बारों में कम ही देखने को मिलते थे। नासिर भाई ने दिलीप कुमार, कपिल देव, नवाब पटौदी जैसी हस्तियों का इंटरव्यू भी लिया। मामू की अंग्रेजी, सब्जेक्ट पर पकड़ और आसान ज़बान में लिखने का फन बहुत नायाब था। उन्हें काम का ऐसा जुनून था कि अपने साथियों का काम भी अपने माथे ले लेते। यहां तक कि दूसरे अखबारों के सहाफी (पत्रकार) भी उनकी मदद ले लेते। हेडिंग, इंट्रो, वैल्यू एडिशन, फोटो सिलेक्शन इन सब में उन्हें महारत हासिल थी। उनकी इसी शराफत का कई साथी फायदा भी उठा लेते। भाई लोग अधूरी खबरें मामू के हवाले करके पार्टी-वार्टी में निकल जाते और इधर मामू रात दो बजे तक बैठ कर उनकी खबरें रीराइट करते रहते। भोपाल की सहाफत में बहुत से लोगों को लिखना मामू ने सिखाया। दरअसल वो किसी को 'ना' कह ही नहीं पाते थे। इसी चक्कर में ज़रूरत से ज़्यादा काम अपने ऊपर लाद लेते। और हां, वैसे तो मामू में कोई ऐब न था… बाकी सिगरेट जम के पीते थे। मगर पैकेट वाली फिल्टर्ड सिगरेट नहीं। अपने पास विल्स का तंबाकू वाला पाउच रखते। फिर बड़े इत्मीनान से हैंड-रोल्ड पेपर में तंबाकू भरते, उसे लपेटते और सुलगा लेते। मजे की बात ये कि जब भी अपने लिए सिगरेट बनाते, साथ बैठे दोस्तों के लिए भी दो-तीन हैंड-रोल्ड सिगरेट तैयार कर देते। सिगरेट का ये शौक़ उन्हें ताज़िन्दगी रहा। उस दौर में अंग्रेज़ी अखबारों के न्यूज़ रूम में पत्रकार खुलेआम सिगरेट पी सकते थे। यहां तक कि संपादक के सामने भी अंग्रेज़ी सहाफी सिगरेट धौंकते रहते। लिहाज़ा खबरें टाइप करते हुए भी मामू के होंठों से सिगरेट लगी रहती। मोती मस्जिद के पास मोती महल में उनकी रिहाइश थी। इब्राहिमपुरा और इक़बाल मैदान के पटियों को भी मामू ने खूब आबाद किया। फोटोजर्नलिस्ट प्रकाश हथवलने, अंग्रेजी सहाफी मरहूम एन.डी. शर्मा और राकेश दीक्षित से उनकी खूब जमती थी। वैसे अख़बारी दुनिया में शायद ही कोई ऐसा बंदा होगा जिससे मामू की न जमती हो। हालांकि काम के बोझ से कई बार झल्ला जाते, मगर उनकी नाराज़गी भी चंद मिनटों की मेहमान होती। हिंदुस्तान टाइम्स में 11 साल लंबी जानदार पारी खेलने के बाद मामू ने पाला बदला। साल 2011 में टाइम्स ऑफ इंडिया की भोपाल लॉन्चिंग टीम में नासिर कमाल भी शामिल थे। उसी सिलसिले में वो मुंबई के वीटी स्थित टाइम्स बिल्डिंग में ट्रेनिंग के लिए गए। तारीख थी 2 अगस्त 2011। भोपाल से दूर जाने से हमेशा गुरेज़ करने वाले मामू को मुंबई में सीवियर हार्ट अटैक आया… और महज़ 55 साल की उम्र में ये शानदार इंसान दुनिया छोड़ गया। भोपाल से अच्छे-भले मुंबई गए मामू ताबूत में लौटे। जिसने भी उनके इंतक़ाल की खबर सुनी, सन्न रह गया। उनके जनाज़े में साथी सहाफ़ियों को फूट-फूट कर रोते देखा गया। उनकी क़ाबलियत, शराफत, सादगी और मददगार तबीयत की यादें आज भी उनके साथियों के ज़ेहन में ताज़ा हैं। नासिर भाई का बड़ा बेटा अज़मत नासिर मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन में आईटी एडवाइज़र है, जबकि दूसरा बेटा आलमगीर बीयूएमएस डॉक्टर है। अंग्रेज़ी सहाफत की उस शरीफ़, क़ाबिल और भोपाली रूह को 'सूरमा की बात' का ख़िराजे अक़ीदत।