भोपाल की सड़कों पर 'भीड़तंत्र' का नंगा नाच और 'खाकी' की मय्यत
*जुबेर कुरैशी*
मुबारक हो! हम इक्कीसवीं सदी के उस 'सुनहरे' दौर में पहुँच चुके हैं जहाँ अदालतें दीवारों में कैद हैं और इंसाफ सड़कों पर 'गोबर' की शक्ल में नंगा नाच रहा है। भोपाल की सड़कों पर जो मंजर देखा गया, वह सिर्फ एक युवक की पिटाई नहीं थी, बल्कि हमारी तथाकथित 'तहजीब' और 'निजाम' (व्यवस्था) के जनाजे की रस्म थी। जब वर्दी की मौजूदगी में भीड़ 'जज ' बन जाए, 'जल्लाद' बन जाए और खुद ही 'मुंसिफ' (न्यायाधीश) होने का ढोंग रचे, तो समझ लीजिये कि हुकूमत ने कानून की चादर तानकर गहरी नींद ले ली है।
भोपाल के गौतम नगर की उस सड़न भरी दोपहर में, जब एक युवक और युवती को होटल से घसीटकर बाहर निकाला गया, तो क्या वहां मौजूद 'मुहाफिज' (रक्षक/पुलिस) का जमीर सो रहा था? यह सवालिया निशान सिर्फ उन चंद पुलिसवालों पर नहीं है, बल्कि उस पूरे 'इंतजामिया' (प्रशासन) पर है जो अमन-ओ-अमान के बड़े-बड़े दावे करता है। उस युवक का चेहरा काला करना, उसे तीन किलोमीटर तक जलील करते हुए घुमाना क्या यह किसी 'सभ्य' समाज की पहचान है? या फिर हम उस 'जंगल के कानून' की तरफ लौट रहे हैं जहाँ ताकत ही सच है?
हैरत तो इस बात पर है कि जिस युवती के नाम पर यह 'तमाशा' रचा गया, उसने खुद चीख-चीख कर कहा कि वह अपनी मर्जी से साथ है। लेकिन साहब! 'भीड़' को आपकी मर्जी से क्या लेना-देना? भीड़ तो 'इश्क' के नाम पर 'इंतकाम' चाहती है। भीड़ को तो 'लव जिहाद' का वह चश्मा पहना दिया गया है जिसमें हर मानवीय रिश्ता एक साजिश नजर आता है। प्रशासन की चुप्पी देखिये कि सड़कों पर गुंडे नाच रहे हैं और पुलिस 'सेल्फ-डिफेंस' की थ्योरी पढ़ रही है।
हम उस दौर में जी रहे हैं जहाँ न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी इसलिए नहीं बंधी कि वह निष्पक्ष रहे, बल्कि इसलिए बंधी है ताकि वह अपने सामने होते इन खौफनाक मंजरों को देख न सके। जब सड़क के आवारा तत्व यह तय करने लगें कि कौन किसके साथ घूमेगा, तो समझिये कि संविधान की रूह तड़प रही है। क्या भोपाल पुलिस का 'अपराध नियंत्रण' का दावा सिर्फ कागजी खानापूर्ति तक सीमित है? अगर सड़कों पर खुलेआम तेजाब का इस्तेमाल हो रहा है और पुलिस सिर्फ 'मूक दर्शक' बनी हुई है, तो आम शहरी अपनी हिफाजत के लिए किसके पास जाए?
यह 'भीड़तंत्र' कोई इत्तेफाक नहीं है, यह एक सोची-समझी 'सियासत' का हिस्सा है। जब आप नफरत की फसल बोएंगे, तो मोहब्बत के फूलों को तो रौंदा ही जाएगा। हुकूमत को शायद यह मुगालता है कि वह भीड़ को पाल-पोसकर कंट्रोल कर सकती है, लेकिन याद रहे कि जब भस्मासुर को वरदान दिया जाता है, तो वह सबसे पहले अपने आका की तरफ ही मुड़ता है। आज यह भीड़ किसी खास युवक के पीछे है, कल यह आपके घर के दरवाजे पर भी दस्तक देगी।
प्रशासन की लाचारी का आलम यह है कि वे इन 'मवालियों' के सामने भीगी बिल्ली बन जाते हैं। क्या पुलिस का 'इकबाल' (रुतबा) इतना खत्म हो गया है कि वह चंद मजहबी नारों के आगे घुटने टेक दे? अगर कानून का राज कायम रखना है, तो इन 'ठेकेदारों' को सलाखों के पीछे होना चाहिए था, न कि सड़कों पर जुलूस निकालते हुए। लेकिन अफ़सोस! यहाँ तो अपराधी ही 'स्वयंभू रक्षक' बनकर घूम रहे हैं।
सरकार की चुप्पी सबसे ज्यादा 'खलनायक' जैसी है। क्या पुलिस प्रशासन सिर्फ ट्विटर पर कानून व्यवस्था सुधारने की कसमें खाएगा? ज़मीनी हकीकत यह है कि अपराधियों के हौसले बुलंद हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उनके पीछे 'वोट बैंक' की ढाल है। साम्प्रदायिक टिप्पणियां करना और खुलेआम हिंसा करना—यह सब अब सामान्य' हो गया है।
शायर राहत इन्दोरी ने खूब कहा था—
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में,
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।
अंत में सवाल तो उस समाज से भी है जो तमाशबीन बना वीडियो बना रहा था। क्या हमारी इंसानियत इतनी मर चुकी है कि हम किसी को जलील होते देखकर सिर्फ अपने फोन का कैमरा ऑन करते हैं? यह सामूहिक मानसिक पतन की निशानी है। भोपाल की सड़कों पर जो खून और गोबर गिरा है, उसने हमारे 'डिजिटल इंडिया' के चमकदार चेहरे पर कालिख पोत दी है।
अगर आज भी सख्त कार्रवाई नहीं हुई, अगर आज भी पुलिस ने अपना 'खौफ' अपराधियों में पैदा नहीं किया, तो मान लीजिये कि हम एक 'असफल राज्य' की ओर बढ़ चुके हैं। इंसाफ की गुहार अब सड़कों की धूल में दब गई है और खाकी की साख उस कीचड़ में मिल गई है जो उस युवक के चेहरे पर मली गई थी। अदालतें खामोश हैं, पुलिस लाचार है, और भीड़ अब नया 'संविधान' लिख रही है।
जयहिंद
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